अपने ही मुल्क में रिफ्यूजी हो गए

यह कविता बँटवारे के उस असह्य दर्द को स्वर देती है, जहाँ लोग अपनी ही ज़मीन पर बेघर और बेनाम हो गए। स्मृतियाँ, सपने और पहचान—सब कुछ पीछे छूट गया, और पीढ़ियों तक न भरने वाला घाव रह गया।

SUDHIR BIRLA

The pain of partition and the suffering of being a refugee in one’s own nation is a wound that never fully heals. An ache carried in silence, where every memory is a home lost, every breath a reminder that the soil beneath your feet no longer recognizes your footsteps, and yet you must keep walking as a stranger among your own. This pain was suffered by millions and its memory still haunts them who passed through it. A short poem:

वो महल, अस्तबल, वो तहखाने,

वो लहराती फसलों के अफ़साने ,

वो चहचहाती चिडियों के अविरत तराने ,

वो दोस्त रिश्तों के मोहब्बत भरे नजराने ,

राख हो गये सब बंटवारे में

उसी राख की स्याही से लिखने हैं कुछ अफ़साने |


अपने ही मुल्क में हम रिफ्यूजी हो गए,

ख्वाब सुनहरे सब अधूरे ही रह गए।

कर्ज़ था ज़िंदगी का? चुकाना ही था,

हाथ की कटी लकीरों को पटाना ही था।

अरमानों को उड़ा दिया कफ़न बनाकर,

परिवार को आत्मश्रयी बनाना ही था।


वह बारह साल का बच्चा,

किसी की दुकान पर खड़ा था |

तराजू से तौलता था वह सामान,

जिनमें दर्द बंटवारे का भरा था|

वह तराजू कद में कुछ उससे बडा था,

कुछ खुशनुमा लोग खुद ही तौल लेते,

लेकिन दर्जा उसका हर तराजू से बड़ा था |


क्या दोष था जन के नेक करम का,

मेहनत से क्यूँ कर आँगन सींचा |

क्या दोष था उनके उन्मुक्त धरम का,

क्यूँ कर सबको ख़ुद में समेटा |


त्राहिमान कर उठा था थल नभ,

लहू रिसती गाड़ियां पहुंची जब |

कितने उजड़े सिंदूर,

कितनी सूनी हुई मांगें |

कितनी बहु बेटियों की अस्मत,

आज भी इंसाफ मांगे |


एक आह्वान पर न्यौछावर कर दीं, वो सोने की चूड़ियाँ,

दुनिया छोड़ने तक, उनका मोल वापस न मिला |

सबने खादी छोड़, हर कपड़े को दी तिलांजलि ,

पर क्या मुआवज़ा? बस बँटवारे का आवरण मिला।

सन सैंतालीस ने जो आग लगाई थी,

नब्बे में वो फिर से भड़काई थी

हम फिर अपने मुल्क में रिफ्यूजी हो गए |


आजादी हेतु, किसी त्याग तपस्या का अफसोस नहीं,

उस आहुति की आंच पर, रोटियां सेंकते आज तक कुछ लोग,

फिर नए बटवारे का सिलसिला चलाने को हैँ,

हमारे शांत हृदय और उन्मुक्त जोश आजमाने को हैं,


कब तक हम लहूलुहान ज़मीन पर

अपनी ही जड़ों का पता पूछते रहेंगे,

कब तक हम अपनी ही मिट्टी पर

अपने ही नाम की दस्तक देते फिरेंगे,

कब तक सरहदें सदियों पुरानी राहें मोड़ती रहेंगी।

कब तक सरहदें दिलों के नक्शे उधेड़ती रहेंगी।

कब तक यह सिलसिला चलेगा,

कब तक हम अपने मुल्क में रिफ्यूजी होते रहेंगे,

कब तक वो बारह साल का बच्चा,

अपने से बड़े तराजू से तिल तिल सपने तौलेगा,

आखिर कब तक

आखिर कब तक

© sudhir birla