मनुष्य अभी हारा नहीं है

यह कविता कठिन समय में मानव साहस, सामूहिक प्रयास और आशा का स्वर है। महामारी के अंधकार में भी यह विश्वास जगाती है कि विज्ञान, सेवा और एकजुटता से मानव फिर विजयी होगा।

SUDHIR BIRLA

seashore during golden hour

Wrote a poem thinking about current situation due to the Pandemic .

मनुष्य अभी हारा नहीं है|


विजय कुछ दूर है किन्तु,

मनुष्य अभी हारा नहीं है,

अनभिज्ञ अगले क्षण से लेकिन,

भाग्य का सहारा नहीं है|


काले बादलों के पीछे,

नज़र आता ध्रुव तारा नहीं है,

खे रहा भरी कश्ती जबकि,

दीखता किनारा नहीं है।


कर रहा स्वीकार हर पल,

राह की चुनौतियों को,

विषाणु से त्रस्त विश्व को,

प्रतिज्ञ है उबारने को।


प्रयत्नरत हैं वैज्ञानिक चिकित्सक, और अनगिनत अग्रणी जन,

छोड़ परिवारों को अपने, चल दिये इस यज्ञ में तपने।


श्रेष्ठ हैं वह प्राणी जो,

स्वयं से ऊपर उठ गए हैं,

नमनीय हैं उनके परिजन,

हित हमारे निज तज दिए हैं।


समय कुछ ऐसा आ गया है,

थोड़ा सा धुंधला छा गया है,

आओ सब मिल योगदान दें,

बादलों का रंग निकाल दें।


विष मुक्त विश्व हो जाएगा,

प्रतिकूल अनुकूल हो जाएगा,

पुनः किरण सूर्य की चमकेगी,

रश्मि विश्व भर दमकेगी।


मानव का उदय पुनः होगा,

हर ह्रदय प्रेम से रत होगा,

जल यह अब खारा नहीं है,

मनुष्य अभी हारा नहीं है।

मनुष्य अभी हारा नहीं है।


© Sudhir Birla