कविता - किसका वश

यह कविता जीवन, विचार और भावनाओं के नियंत्रण पर गहरा प्रश्न उठाती है। क्या ज़िंदगी हमारे वश में है, या हम किसी अदृश्य प्रवाह के अधीन बह रहे हैं—यही इस रचना का मूल आत्मचिंतन है।

SUDHIR BIRLA

रफ्ता रफ्ता चल रही है ज़िंदगी,

या कोइ चला रहा है,

धड़्कनों की तरंगों की तरह,

कौन मुझे बुला रहा है!


वह बोले.....हाथ में तेरे है ज़िंदगी,

डूब जा रस में इसके;

नाहक सोचता रहा मैं,

मैं हूँ वश में किस के!


विचारों का निरंतर आवागमन,

चित्रपट पे चलचित्र की तरह, (स्वत: ही);

भोर से सांझ तक और पुन: भोर तक,

कौन जाने, हाथ में है किस के!


खुशियां सब से कहती हैं,

मैं सबका, सब मेरे हैं,

अश्रु खुद से कह्ते हैं,

तन्हा मैं नहीं, मन मेरा है!


ज़मी पर अवतरण और,

फिर लुप्त हो जाना कहीं,

कुछ पल की ज़िंदगी के बीच,

मैं बस में किस-किस के!


© sudhirbirla