घरेलू कामगार - छोटी कविता और एक गीत के माध्यम से श्रद्धांजलि
यह कविता और गीत उन घरेलू कामगारों को समर्पित है, जिनकी मेहनत से घर चलते हैं पर जिनकी पहचान अक्सर अनदेखी रह जाती है। “नूरानी” के माध्यम से यह रचना सम्मान, अधिकार और संवेदनशीलता की एक शांत लेकिन ज़रूरी पुकार है।
(1)
बच्चों की फर्माइश,
राशन का सामान,
साहब का पीक दान,
मेम साहब कि ज़ुबान,
(2)
सुबह से हो जाती शाम,
मिलता ना आराम,
अपने सपनों कि उड़ान,
को मिलता ना आसमान,
(3)
मैं भी हूँ नारि,
अपने परिवार कि प्यारि,
किस किस के बर्तनों मैं,
घिस घिस गये अरमान,
(4)
कभी पिस् गई,
कभी पीसी गई,
खुश रहने को, सोचा भी तो,
बुंदें बस , छलक गईं;
(5)
आखिरि तारीख महीने की,
खाली पेट ही यूं, बीत गई;
तेरी चौखट पे, येह ज़िंदगी;
सूनी सेज सी, बीत गई;
(6)
फिर भी रोई नहीं,
बस खट्ती रही,
सुख देने को, बिमार घर को,
तसल्लि झूठी देती रही,
Jingle Starts
(7)
मैं Domestic Worker नूरानि,
मैं घर घर कि हूँ रानी,
जिस दिन काम मै Miss कर दूं,
Mem हो जाये पानी पानी,
फिर भी कदर मेरी,
किसी ने क्यूं कर ना जानी,
मैं Domestic Worker नूरानि,
(8)
कमरों, Family के हिसाब से,
तनखवाह सब Fix करते,
Payment के नाम पे,
करते सब मनमानी,
मैं Domestic Worker नूरानि,
(9)
Risk कितना हैं हम लेते,
घर घर मारे फिरते,
अंजाने लोगों से,
इज़्ज़त अपनी है बचानि,
मैं Domestic Worker नूरानि,
(10)
अपना ना कोई Register,
ना Government का कोई दफ्तर,
ना Fixed Salary का हिसाब,
ना Pension ही है पानी,
मैं Domestic Worker नूरानि,
(11)
आज खुश हूँ, इस तसल्लि से,
कुछ लोगों ने, सोचा मुझे,
बाई को हक़ 'लेबर' का दिलाने को,
जनता को संवेदनशील, बनाने को,
(12)
I am thankful to you guys,
But thinking दिन मैं twice,
रह जाये ना सिर्फ ये कहानी,
मैं domestic worker नूरानि!
© sudhirbirla