कविता - क्या अच्छा होना बुरा है?
यह कविता अच्छाई और बुराई के द्वंद्व पर गहरा आत्मचिंतन है। समाज, धर्म, सत्ता, प्रकृति और अंतर्मन से सवाल करते हुए यह रचना उस समय की पीड़ा को उकेरती है, जहाँ झूठ सच प्रतीत होता है। फिर भी, अंत में आशा, कर्म, सत्य और धर्म के प्रकाश पर अटूट विश्वास इस कविता को अर्थ और दिशा देता है।

मंदिर के दरबानों से,
मस्जिद की आज़ानो से,
गिरिजा की मीनारों से,
और सभी गुरुद्वारों से,
मैंने पूछा___ क्या अच्छा होना बुरा है?
(ii)
शमा पे जलते परवानों से,
मादकता के दीवानों से,
सूनी राह के मुसाफिर से,
और इल्ज़ाम लिए काफ़िर से,
मैंने पूछा___ क्या अच्छा होना बुरा है?
(iii)
अमीरों से, शहंशाहों से,
सरकारी नौकरशाहों से,
सफ़ेद कुर्तेधारी से,
और सड़क के भिखारी से,
मैंने पूछा___ क्या अच्छा होना बुरा है?
(iv)
दिल में वीरान किनारों से,
आसमान में सितारों से,
जीवन के सभी सहारों से,
फूलों से, बहारों से,
मैंने पूछा___ क्या अच्छा होना बुरा है?
(v)
दीपक की लौ, और चिराग से,
मोहन वीणा के राग से,
जल से, जीवन धार से,
प्यार की पुकार से,
मैंने पूछा___ क्या अच्छा होना बुरा है?
(vi)
चरिन्दों से, परिंदों से,
निर्बल से, साकारों से,
होनी से, अनहोनी से,
सम्राटों के दरबारों से,
मैंने पूछा___ क्या अच्छा होना बुरा है?
(vii)
पहाड़ों से, झरनों से,
उफनती नदिया की धारों से,
स्वप्नों की उड़ान के, न दीखते किनोरों से,
मैंने पूछा___ क्या अच्छा होना बुरा है?
(viii)
दर्द हे, दुःख है, पीड़ा है, घ्रणा है, समस्त व्योम में व्याप्त ।
चिंता है, बेचैनी है, अँधेरा है, न है रौशनी पर्याप्त।।
प्रतीत होता है जैसे, झूठ ही सच्चा है ।
सोचता हूँ शायद, बुरा ही अच्छा है ।।
(ix)
किन्तु…
आशा है अभी, और है विश्वास।
कर्मभूमि में, गीता का न होगा उपहास।।
सर्वदा की भांति,
झूठ का होगा अन्त, बुराई का होगा सर्वनाश।
सृष्टि में,
सत्य और धर्म का, होगा प्रज्वलित प्रकाश।।
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