समय समय पर लिखी पंक्तियां

ये पंक्तियाँ जीवन, स्मृति, नशा, आस्था और आत्मखोज के बीच की छोटी-छोटी ठहराव भरी साँसें हैं। कभी सवाल बनकर, कभी सपना बनकर, ये शब्द भीतर की बेचैनी और उम्मीद—दोनों को एक साथ छूते हैं।

SUDHIR BIRLA

जुआरी वो भी है, जुआरी हम भी हैं !

नशीला वो भी है, नशे में हम भी हैं !

नशा किसका, खबर नहीं !

नशा जिसका, कदर नहीं !

खुदा खुद में ढूंढू, या तुझमें पाऊं !

तुझे खबर नहीं, मुझे सबर नहीं !

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खोया हूँ ख्वाबों में कहीं !

नयी सुगंध, नयी ज़िन्दगी !

उस पार उड़ चलूँ कहीं!

परिंदों से पंख ले,

किरण उषा की देख,

नयी उमंग, नए बरस की सुबह!

नए सुर , नए गीत,

नया जीवन, नयी दिशा,

पर वही दोस्त, वही रिश्ते,

वही हंसी और वही लम्हे,

तू जी ले ज़रा .......

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काहे सोचे रे बंदे,

तेरे बाद भी तेरा ज़िक्र हो;

आज जी ले अंदाज़ में अपने,

कल की क्यों कर फिक्र हो;

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मेरा आशियाँ है कहाँ,

नभ औ समुंदर मिले जहां,

ये किनारे कहते हैं मुझसे,

उठ मुसाफ़िर चल दें वहाँ।

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हर पत्ता शाख से कहता है ,

बारिश का मंज़र देखकर,

गिराकर जहाँ में मुझे ,

कोई उठाने वाला ना मिला ।

गिराया जिस झोंके ने मुझे,

उसका पता बताने वाला ना मिला ।

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दीवारो दर इस खंडहर की देखकर लगता है,

कभी किसी के ख़्वाबों का महल रहा होगा,

आज ज़ार ज़ार है, इस हाल में है, तो क्या है ,

किसने देखा है कल सवेरा फिर कहां होगा।


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कभी मिलाये उसी शहर से

जिससे है जन्म का नाता

स्वच्छ जलधारा सतलुज की

पावन पवन के शीतल झोंके

बचपन के कुछ बरस कटे

पुरानी यादें जो ना मिटे

यात्रा जन्म भूमि की

कभी कभी कराये विधाता

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© sudhirbirla