कविता - इच्छा प्रभु मिलन की

यह कविता जीवन की आपाधापी में ठहरकर आत्मचिंतन और आत्म-खोज की यात्रा है। बाहरी शोर से दूर, अंतर्मन में उतरकर ईश्वर, स्वयं और सत्य से साक्षात्कार का भाव इसमें सहज रूप से व्यक्त हुआ है। कवि, गुरु और प्रभु—तीनों के माध्यम से यह रचना प्रेम, वैराग्य और आत्मबोध की ओर ले जाती है।

SUDHIR BIRLA

(i)

जीवन की गहमा गहमी में,

हर रोज़ की आपाधापी में।

ठहर जाना चाहता हूँ,

में सहर शीतल चाहता हूँ।।

(ii)

भीड़ में, कोलाहल में,

दृष्टिहीन, दिशाहीन इस जीवन में।

आत्म मंथन चाहता हूँ,

में परम आत्मन चाहता हूँ।।

(iii)

आंधी अंधड़ से जीवन में,

तूफ़ान के तेज़ थपेड़ों में।

खो गया जाने कहाँ मैं,

खुद को पाना चाहता हूँ।।

(iv)

खोजने तुझको प्रभु मैं,

दौड़ता हूँ तेज़ जितना।

दूर होता हूँ स्वयं से,

और तुझसे, और भी मैं।।

(v)

बैठता हूँ स्थिर हो जब,

शोर में एकांत पाकर।

तन मन आत्मन एक करता,

झांकता जब खुद के भीतर।।

दर्श करता प्रभु मैं तेरा,

और स्वयं को हूँ मैं पाता।।

(vi)

अद्रश्य है पर,

चाहता हूँ देखना उसे मैं।

अश्रव्य है पर,

चाहता हूँ सुनना उसे मैं।

अचिन्त्य है पर,

चाहता हूँ चिंतन उसी मैं।।

(vii)

भिन्न होता वह जो मुझसे,

वृक्ष और तरु की जो भांति।

दर्श करता फिर मैं उसका,

और जीवों की ही भांति।।

(viii)

लुप्त है, पर है निरंतर,

ह्रदय में मेरे वह समाया।

मिलन की हो जब भी इच्छा,

दूर कर लूं मन की काया।।

(ix)

स्वप्न दिखाता है कविवर,

बैठता है शीर्ष ऊपर।

देह को संगमरमर बताता,

और उड़ाता कल्पना में।।

(x)

है गुरु दिखाता आइना,

उतार देता सतह देह की।

अस्थि पिंजर है दिखाता,

स्वयं से परिचय करता।।

(xi)

शीर्ष पर रखो कवि को,

प्रेम उत्पन वह कराता।

गुरु चरणन में शरणागत हो,

प्रभु मिलन की राह दिखाता ।।

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