नज़्म- याद कर आज फिर

यह नज़्म स्मृतियों के उन नर्म-नाज़ुक पलों की दास्तान है, जहाँ मोहब्बत कहे बिना भी पूरी तरह महसूस की जाती है। बीते लम्हों की चमक, बिछड़ने की टीस और आज भी ज़िंदा इंतज़ार—सब मिलकर एक ख़ामोश रोदन बन जाते हैं।

SUDHIR BIRLA

फर्श पे बिखरें हैं ,बहुत से मोती ;

याद कर तुझको, बहुत रोया है कोई ;

तनहा दिल उमरों से, तेरा है तेरा ;

गुज़रे लम्हातों में दिल, खोया है कोई I

याद कर आज फिर, बहुत रोया है कोई I

याद कर आज फिर,

चलके आने से तेरे, दिल उठता था चहक ;

संग होने से तेरे, सांसें जाती थी दहक ;

कुछ पल का साथ सफर, वो सौंधी सी महक ;

याद कर आज फिर, बहुत रोया है कोई I

गुज़रे लम्हातों में दिल, खोया है कोई I

याद कर आज फिर,

खुशनसीब किताबों के, पन्ने वो पलटना तेरा ;

कुछ अंदाज़े ख़यालात, वो बयान करना तेरा ;

होना रुखसत यूँ ही, न फिर मिलना तेरा;

याद कर आज फिर, बहुत रोया है कोई I

गुज़रे लम्हातों में दिल, खोया है कोई I

याद कर आज फिर,

गली कूचों से दीदार को, जाना वो मेरा ;

वक़्त बेवक़्त झरोखे पे, जब आना वो तेरा ;

लुक छुप के सुर्ख चेहरे का, दीदार सुनेहरा ;

याद कर आज फिर, बहुत रोया है कोई I

गुज़रे लम्हातों में दिल, खोया है कोई I

याद कर आज फिर,

हमसफ़र हमराह ग़र,, हो जाती मेरी;

यक़ीनन मोहब्बत थी,जुस्तजू थी तेरी ;

इकतरफा इज़हार का, रद्द ए 'अमल ;

याद कर आज फिर, बहुत रोया है कोई I

गुज़रे लम्हातों में दिल, खोया है कोई I

याद कर आज फिर ,

इल्म तुझको नहीं, दिल मुन्तशिर मेरा ;

रोज़ ख्वाबों ही में, हुआ दीदार तेरा ;

तू ही नज़्म, है सरगम, धुन ज़िन्दगी की ;

सप्त सुरों को खोकर, शब् से सोया है कोई ;

याद कर आज फिर, बहुत रोया है कोई I

फर्श पे बिखरें हैं ,बहुत से मोती ;

गुज़रे लम्हातों में दिल, खोया है कोई I

याद कर आज फिर ,


© Sudhir Birla