मन का रावण

“मन का रावण” बाहरी बुराइयों से अधिक, भीतर छिपे अहंकार, वासनाओं और अज्ञान पर प्रहार करती कविता है। यह स्मरण कराती है कि सच्चा रावण-वध आत्मचिंतन, संयम और श्रीराम-ध्यान से ही संभव है।

SUDHIR BIRLA

आज रावण को जलते देख कुछ शब्द लिखने की इच्छा जाग्रत हुई :


मन का रावण


गूँज रहा है धरा पे शोर ,

मैदानों में लगी है होड़ ,

असंख्य रावण जल रहे चहुँ ओर ,

पर मन का रावण नहीं जला |


दश शीश कट गिरे भूमि पर ,

लीलाओं की लीक पटी है ,

सटीक नाभि पर बाण चला ,

पर मन का रावण नहीं जला |


कभी गूँज थी अट्टहास की,

और सिंहासन का मान बड़ा ,

है आज भूमि पर पतित पड़ा ,

पर मन का रावण वहीँ खड़ा |


सदियों से जलता आया है ,

धुएँ का बादल छाया है ,

दसों इन्द्रियों की माया है ,

मन के रावण की काया है ,

प्रतिकारक तो जल रहा है कब से ,

मन में है यह रहा अड़ा ,

मन का रावण वहीँ खड़ा |


जाग्रत हो चक्षु अब खोलो ,

प्राण श्वास से अंतर्मन धोलो ,

श्रीराम ध्यान से वश करने की ,

अब बारी है रावण वध की |

अब बारी है रावण वध की |

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