
कविताएँ
कुछ अनकही अनुभूतियाँ, समाज के मौन प्रश्न और जीवन के सूक्ष्म सत्य—
कवितायेँ शब्दों के माध्यम से मनुष्य, समय और संवेदना का सजीव प्रतिबिंब प्रस्तुत करती हैं।
उर्मिला की भूमिका
यह कविता उर्मिला के उस मौन, अप्रत्यक्ष और अतुलनीय त्याग को स्वर देती है, जो रामायण की कथा में अक्सर अनदेखा रह जाता है। लक्ष्मण के धर्मपथ पर अग्रसर होने के पीछे उर्मिला का संयम, निद्रा-त्याग और आत्मबल ही वह शक्ति है, जिसने इतिहास की धारा को दिशा दी। प्रेम, कर्तव्य और आत्मोत्सर्ग की यह कविता उर्मिला की अद्वितीय भूमिका को श्रद्धांजलि है।
अभिमन्यु का भाग्य
यह कविता महाभारत के सबसे करुण और अन्यायपूर्ण प्रसंग—अभिमन्यु के वध—को भाग्य, षड्यंत्र और धर्म के प्रश्नों के साथ प्रस्तुत करती है। अधूरा ज्ञान, अनुपस्थित मार्गदर्शक और नियमों से परे युद्ध ने एक वीर पुत्र को बलि बना दिया। यह रचना पूछती है—क्या यह केवल भाग्य था, या नियति के नाम पर रचा गया अन्याय?
धर्म अधर्म - विडम्बना
“धर्म–अधर्म : विडम्बना” महाभारत की घटनाओं के माध्यम से नैतिकता, सत्ता और न्याय के द्वंद्व को उजागर करती एक विचारोत्तेजक कविता है। यह प्रश्न उठाती है कि जब धर्म की व्याख्या स्वार्थ से होने लगे, तो धर्मयुद्ध के बाद भी शांति क्यों अप्राप्य रह जाती है।
मन का रावण
“मन का रावण” बाहरी बुराइयों से अधिक, भीतर छिपे अहंकार, वासनाओं और अज्ञान पर प्रहार करती कविता है। यह स्मरण कराती है कि सच्चा रावण-वध आत्मचिंतन, संयम और श्रीराम-ध्यान से ही संभव है।
पौरुष को आह्वान
यह कविता स्त्री–पुरुष समानता, सामाजिक कुरीतियों और पौरुष की वास्तविक परिभाषा पर सशक्त विमर्श है। “पौरुष को आह्वान” नारी को अधीन नहीं, सहचरी मानने का आग्रह करती है और संवेदनशील, न्यायपूर्ण तथा उत्तरदायी पुरुषत्व की पुकार बनती है।
बिसात
“बिसात” एक गहन आत्ममंथन की कविता है, जो सामाजिक हैसियत, पद, धन और पहचान के प्रश्नों से आगे जाकर जीवन की सादगी और आध्यात्मिक समानता को उजागर करती है। यह रचना बताती है कि जब भीतर ईश्वर-बोध जागता है, तब ऊँच–नीच और बिसात के सभी मापदंड अर्थहीन हो जाते हैं।
परिधि का परिंदा
“परिधि का परिंदा” मनुष्य की स्वनिर्मित सीमाओं पर एक गहन कविता है। यह रचना बताती है कि कैसे मनुष्य स्वतंत्रता होते हुए भी भेद, सीमाएँ और लालसा गढ़कर स्वयं को बंधनों में कैद कर लेता है।
मोड़ कर छूटा हुआ इक पन्ना
यह रचना उस अनकहे अकेलेपन, टूटे भरोसे और आत्ममंथन की कथा है—जहाँ इंसान खुद को जीवन की किताब में एक ऐसे पन्ने की तरह पाता है, जो मोड़कर छोड़ दिया गया हो। स्मृतियों, रिश्तों और अस्तित्व के सवालों के बीच यह कविता संवेदनाओं की गहरी परतों को छूती है।
कविता - क्या अच्छा होना बुरा है?
यह कविता अच्छाई और बुराई के द्वंद्व पर गहरा आत्मचिंतन है। समाज, धर्म, सत्ता, प्रकृति और अंतर्मन से सवाल करते हुए यह रचना उस समय की पीड़ा को उकेरती है, जहाँ झूठ सच प्रतीत होता है। फिर भी, अंत में आशा, कर्म, सत्य और धर्म के प्रकाश पर अटूट विश्वास इस कविता को अर्थ और दिशा देता है।
कविता - इच्छा प्रभु मिलन की
यह कविता जीवन की आपाधापी में ठहरकर आत्मचिंतन और आत्म-खोज की यात्रा है। बाहरी शोर से दूर, अंतर्मन में उतरकर ईश्वर, स्वयं और सत्य से साक्षात्कार का भाव इसमें सहज रूप से व्यक्त हुआ है। कवि, गुरु और प्रभु—तीनों के माध्यम से यह रचना प्रेम, वैराग्य और आत्मबोध की ओर ले जाती है।
जिससे उत्पन्न, उसी में अर्पण
यह कविता सृष्टि की एकात्मकता और जीवन के चक्र का गहन चिंतन है। जैसे महाद्वीप ऊपर से अलग दिखते हैं पर भीतर से जुड़े होते हैं, वैसे ही समस्त जीव, प्रकृति और चेतना एक ही स्रोत से उत्पन्न होकर उसी में विलीन होते हैं। यह रचना सृष्टि, प्रकृति और ईश्वरीय सर्वव्यापकता के प्रति समर्पण का भाव प्रकट करती है।
कविता - कौन हूँ मैं?
यह कविता “कौन हूँ मैं?” आत्म-अन्वेषण की गहन यात्रा है, जो भगवद्गीता के श्लोकों से प्रेरित होकर अस्तित्व, चेतना और आत्मा के प्रश्न को उठाती है। नकार के माध्यम से कवि स्वयं को प्रकृति, देवत्व, भाव और भौतिकता से अलग करता हुआ उस सत्य की खोज करता है, जो शब्दों और परिभाषाओं से परे है। यह रचना आत्मबोध, अद्वैत और “मैं कौन हूँ” के शाश्वत प्रश्न पर एक चिंतनशील काव्यात्मक प्रयास है।
कविता - दरख्तों ने छांव छीन ली
“दरख़्तों ने छांव छीन ली” बदलते समय की उस विडंबना पर कविता है, जहाँ जो कभी संरक्षण और सुकून का प्रतीक थे, वही असुरक्षा का कारण बन जाते हैं। यह रचना जीवन की नश्वरता, टूटते आश्रयों और स्वार्थ के बीच खोती मानवीय संवेदना को प्रकृति के बिंबों के माध्यम से गहराई से अभिव्यक्त करती है।
कविता - क्यूं ना बदला मैं
“क्यूं ना बदला मैं” परिवर्तन के बीच स्थिर रह जाने की पीड़ा और आत्मस्वीकार की कविता है। बदलते समय, रिश्तों और हालातों के बीच कवि अपने न बदल पाने की आदत पर ठहरकर सवाल करता है—जहाँ फरेब, दूरी और स्मृतियाँ धीरे-धीरे धुंधली हो जाती हैं। यह रचना आत्ममंथन, विरक्ति और उस मानवीय जड़ता का संवेदनशील चित्रण है, जो सब बदलने पर भी भीतर को वैसा ही छोड़ देती है।
नज़्म - हवा चली जो हल्के हल्के
“हवा चली जो हल्के-हल्के” एक संवेदनशील नज़्म है, जो प्रेम, विरह और आत्ममंथन की भावनाओं को बेहद कोमलता से उकेरती है। यह रचना इश्क़ की नाज़ुक रवानी, अकेलेपन की टीस और ईश्वर-समान प्रेम की तलाश को शब्दों में पिरोती है—जहाँ एक हल्की हवा भी पूरी ज़िंदगी को फिर से कोरा कर जाती है।
सड़क के पहलू के कुछ पत्थर
“सड़क के पहलू के कुछ पत्थर” मेहनतकश जीवन की कठोर सच्चाइयों पर लिखी गई एक मार्मिक कविता है। यह रचना श्रम, विवशता और टूटते सपनों के बीच इंसान के पत्थर होते जाते भावों को उकेरती है—जहाँ रोज़ी-रोटी, समय और ज़िंदगी सब धीरे-धीरे पत्थर सी हो जाती हैं।
भटका हुआ मुसाफिर
“भटका हुआ मुसाफिर” घर, पहचान और मंज़िल की तलाश में भटके मन की कविता है। यह अकेलेपन, अनकहे सवालों और आत्म-खोज की उस यात्रा को उकेरती है, जहाँ रास्ते हैं—पर ठहराव नहीं।
झूठ के पांव नहीं होते
झूठ के पांव नहीं होते, सुना था ,सच का अक्स नहीं होता, पता था
शराफत टपकती है चेहरे से, बोलते थे लोग पीछे पीठ के ज़हर, जाने क्यूँ घोलते थे लोग
कविता - कवि को नमन
बचपन से मुझे साहित्य, विशेषकर कविताओं को पढ़ने का शौक रहा है | चाहे वह रामधारीसिंह दिनकरजी की रश्मिरथी हो या मैथली शरण गुप्त जी की साकेत, चाहे मुंशी प्रेमचंद जी की सामाजिक पहलुओं को उजागर करती पुस्तकें हों या फिर हीर राँझा, लैला मजनू, शीरीं फरहाद, ढोला मारू, जैसी ह्रदय को वेदना देती दस्ताने, गीता के उपदेश हों या श्री रामचरित का व्याख्यान, मीराबाई, सूरदास के पद हों , बुल्ले शाह जी का सूफी कलाम अथवा कबीर दास जी के दोहे, सभी आत्मज्ञान की तरफ दिशान्तरित करते है| हिंदी के कुछ श्रेष्ठ रचनाकार जैसे दिनकरजी, मैथली शरण जी, सुभद्रा कुमारी चौहान जी, अज्ञेयजी, जयशंकर प्रसाद जी, डॉ हरिवंशराय जी, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी, शिवमंगल सिंह सुमन जी, कुमार विश्वास जी और विशेषकर गोपालदास नीरज जी से मैं प्रभावित रहा हूँ | मेरे विचार से रचनाकार , न केवल समाज का आइना है, अपितु समाज को दिशा देने का भी कार्य करता है| वह गागर में सागर भर, अंतर्मन को झिंझोड़ के रख देता है| आज मैं अपनी श्रद्धा कवियों के प्रति कुछ पंक्तियों के माध्यम से समर्पित कर रहा हूँ....
जी हाँ हुज़ूर, पैसा बोलता है
पैसा आज केवल माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता बन चुका है।
यह कविता उस सच को उजागर करती है जहाँ मूल्य, रिश्ते और विवेक—सब उसकी आवाज़ में दब जाते हैं।
“जी हाँ हुज़ूर, पैसा बोलता है” हमारे समय की एक तीखी सामाजिक टिप्पणी है।
किससे’ ऊँचा उठ जाऊं मैं , उस कद को खोज रहा हूँ मैं
यह कविता मनुष्य की अंतहीन तुलना, महत्वाकांक्षा और “किससे बड़ा” होने की बेचैनी को उजागर करती है।
बाहरी ऊँचाइयों की तलाश में भटके मन का सवाल है—कद का माप आखिर किससे तय हो?
यह रचना आत्ममंथन की ओर ले जाती है, जहाँ उत्तर बाहर नहीं, भीतर छिपा है।
कविता - किसका वश
यह कविता जीवन, विचार और भावनाओं के नियंत्रण पर गहरा प्रश्न उठाती है।
क्या ज़िंदगी हमारे वश में है, या हम किसी अदृश्य प्रवाह के अधीन बह रहे हैं—यही इस रचना का मूल आत्मचिंतन है।
जीवन एक रंगमंच
यह कविता जीवन को एक रंगमंच मानकर मानव की भूमिकाओं, पहचान और आध्यात्मिक यात्रा को दर्शाती है।
पात्र बदलते हैं, आवरण बदलते हैं, पर मंच और चेतना निरंतर बनी रहती है।
जीवन- एक व्यूह चक्र
यह कविता जीवन को एक व्यूह चक्र के रूप में प्रस्तुत करती है—जहाँ जन्म से ही अपेक्षाएँ, भूमिकाएँ और सामाजिक ढाँचे मनुष्य को बाँध लेते हैं।
निर्दोष शिशु के माध्यम से यह रचना प्रश्न उठाती है कि क्या जीवन सच में स्वतंत्र है, या पूर्वनिर्धारित चक्र का अनवरत दोहराव।
आऊंगा फिर मिलने तुझसे, ऐ मेरे शहर
यह कविता शहरों से हो जाने वाली उस अनकही मोहब्बत की कहानी है, जहाँ जगहें नहीं बल्कि उनसे जुड़े लम्हे दिल में बस जाते हैं।
यादें, मिट्टी और रिश्ते—सब मिलकर शहर को सिर्फ़ एक जगह नहीं, एक एहसास बना देते हैं।
मेरे हीर राँझा (पंजाबी) - वारिस शाह नूं दरख्वास्त
यह नज़्म वारिस शाह से एक भावनात्मक संवाद है, जहाँ प्रेम, पीड़ा और विरह के सवाल उठते हैं।
हीर–रांझा के किस्से के ज़रिये यह कविता इश्क़ की आज़ादी और उसके शाश्वत वजूद की पुकार बन जाती है।
मनुष्य अभी हारा नहीं है
यह कविता कठिन समय में मानव साहस, सामूहिक प्रयास और आशा का स्वर है। महामारी के अंधकार में भी यह विश्वास जगाती है कि विज्ञान, सेवा और एकजुटता से मानव फिर विजयी होगा।
बचपन की यादें
यह कविता बचपन की उन अनमोल स्मृतियों का उत्सव है, जहाँ हर छोटी-सी बात भी जीवन का बड़ा सुख बन जाती थी।
खेल, स्कूल, दोस्ती, शरारतें और त्यौहार—सब मिलकर उस मासूम समय की तस्वीर रचते हैं, जिसे याद कर दिल आज भी भीग जाता है।
अपने ही मुल्क में रिफ्यूजी हो गए
यह कविता बँटवारे के उस असह्य दर्द को स्वर देती है, जहाँ लोग अपनी ही ज़मीन पर बेघर और बेनाम हो गए।
स्मृतियाँ, सपने और पहचान—सब कुछ पीछे छूट गया, और पीढ़ियों तक न भरने वाला घाव रह गया।
नज़्म -मैं तेरे ज़ख्मों का मरहम तो नहीं
यह नज़्म स्मृतियों के उन नर्म-नाज़ुक पलों की दास्तान है, जहाँ मोहब्बत कहे बिना भी पूरी तरह महसूस की जाती है।
बीते लम्हों की चमक, बिछड़ने की टीस और आज भी ज़िंदा इंतज़ार—सब मिलकर एक ख़ामोश रोदन बन जाते हैं।
नज़्म- याद कर आज फिर
यह नज़्म स्मृतियों के उन नर्म-नाज़ुक पलों की दास्तान है, जहाँ मोहब्बत कहे बिना भी पूरी तरह महसूस की जाती है।
बीते लम्हों की चमक, बिछड़ने की टीस और आज भी ज़िंदा इंतज़ार—सब मिलकर एक ख़ामोश रोदन बन जाते हैं।
रामचरितमानस की रचना गोस्वामी तुलसीदासजी ने अवधी में की है | कुछ सप्ताह पूर्व मेरे साथ एक घटना घटित हुई जो मैं साझा कर रहा हूँ | मंगलवार को प्रभात समय में सुन्दरकाण्ड सुनने के पश्चात बुधवार को प्रातः कुछ ऐसा एहसास हुआ जैसे गोस्वामी जी स्वयं स्वप्न में आ कर कह रहे हों की "चूँकि कई अवधी शब्दों का अर्थ तुम नहीं समझ पाते हो, अत: श्री सुन्दरकाण्ड को हिंदी कविता के रूप में लिखो ताकि तुम स्वयं इसे समझ पाओ" | मैंने इस को एक स्वप्न समझ भुलाने की चेष्टा की, क्यूंकि मुझमें ऐसी प्रतिभा कहाँ| किन्तु सुबह शाम यह भावना निरंतर मन को परेशान करती रह्ती और ऐसा प्रतीत होता था जैसे गोस्वामी तुलसीदासजी स्वयं बारम्बार मुझे लिखने हेतु प्रेरित कर रहे हों | अंतत: ईश्वर का ध्यान करने के उपरान्त श्री सुन्दरकाण्ड में जो चौपाइयों तथा दोहों के अर्थ हिंदी में दिए हुए हैं, उन्हें हिंदी कविता रूप में लिखने का प्रयत्न शुरु किया। चार सप्ताह उपरान्त मंगलवार के ही दिन ईश्वर कृपा से यह कार्य संपन्न हुआ| कोई त्रुटि हो, तो क्षमा करें, क्यूंकि न मैं कवि हूँ, न ही कविता शैली में महारथ रखता हूँ| चूँकि रूचि है, इसलिए कभी कभी छोटी कविता की रचना कर लेता हूँ |यह रचना श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड का भावानुवाद है, जिसे अवधी से सरल हिंदी कविता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उद्देश्य है—हनुमानजी की भक्ति, पराक्रम, नीति और श्रीराम–सीता के विरह-संयोग के गूढ़ भावों को सहज भाषा में समझना और आत्मसात करना। यह काव्य श्रद्धा, साधना और आत्मिक अनुभूति का विनम्र प्रयास है।
सुन्दरकाण्ड - गोस्वामी तुलसीदासजी (हिंदी कविता रूप)
समय समय पर लिखी पंक्तियां
ये पंक्तियाँ जीवन, स्मृति, नशा, आस्था और आत्मखोज के बीच की छोटी-छोटी ठहराव भरी साँसें हैं। कभी सवाल बनकर, कभी सपना बनकर, ये शब्द भीतर की बेचैनी और उम्मीद—दोनों को एक साथ छूते हैं।
घरेलू कामगार - छोटी कविता और एक गीत के माध्यम से श्रद्धांजलि
यह कविता और गीत उन घरेलू कामगारों को समर्पित है, जिनकी मेहनत से घर चलते हैं पर जिनकी पहचान अक्सर अनदेखी रह जाती है।
“नूरानी” के माध्यम से यह रचना सम्मान, अधिकार और संवेदनशीलता की एक शांत लेकिन ज़रूरी पुकार है।

















































