मेरे हीर राँझा (पंजाबी) - वारिस शाह नूं दरख्वास्त

यह नज़्म वारिस शाह से एक भावनात्मक संवाद है, जहाँ प्रेम, पीड़ा और विरह के सवाल उठते हैं। हीर–रांझा के किस्से के ज़रिये यह कविता इश्क़ की आज़ादी और उसके शाश्वत वजूद की पुकार बन जाती है।

SUDHIR BIRLA

ओ वारिस,

तेरा राँझा ते तेरी हीर,

मैनूं समझ न आयी मेरे पीर,

ऐ तेरी की सी तक़रीर,

तू इंज क्यूं लिखी दोवां दी तक़दीर,

डोलि वरगी ऐ दुनिया,

विच बैठी सी हीर,

डिगदे हंजू सुर्ख अखाँ तो,

मुड़ मुड़ वेखे वीर,

राँझा रब वरगा,

ते रूह वरगी है हीर,

मिलणा, विछोड़ा ते फिर मिलणा,

रूह नूं किवें रोके सरीर,

किस्सा इश्के दा वारिस,

देंदा ऐ क्यूं दिल नूं चीर,

तब्दील कर वरका किताबे इश्क़ दा,

ना रहवे ऐ मन दिलगीर,

हम-नफ़स फिरन आज़ाद,

बेड़ियाँ मुहबत्तां दी कट दे,

तेरी नज़मा विच जिस करके दरद है,

उस ज़माने दी सलवटां कड दे,

ओ वारिस,

इस ज़माने दा रहबर तू,

हीर रांझे नूं मिलण दे,

इश्क़े दा वज़ूद रहवे क़ायम,

अपनी नज़म नवें रंग इच रंग दे,

तू, अपनी नज़म नवें रंग इच रंग दे,


© sudhirbirla