बिसात

“बिसात” एक गहन आत्ममंथन की कविता है, जो सामाजिक हैसियत, पद, धन और पहचान के प्रश्नों से आगे जाकर जीवन की सादगी और आध्यात्मिक समानता को उजागर करती है। यह रचना बताती है कि जब भीतर ईश्वर-बोध जागता है, तब ऊँच–नीच और बिसात के सभी मापदंड अर्थहीन हो जाते हैं।

SUDHIR BIRLA

क्या मेरी कोई बिसात नहीं,

ना कुर्सी पे, ना पदवी पे,

आम हूँ मैं, कुछ ख़ास नहीं,

क्या मेरी कोई बिसात नहीं,


ढो ढो पत्थर, महल बनाऊँ,

किसी के घर को, रोज़ सजाऊँ,

दफ़्तर दुकान में औक़ात नहीं,

क्या मेरी कोई बिसात नहीं,


कुछ पाने को, कुछ खोने को,

जाग के जग में, फिर सोने को,

इससे अधिक कुछ बात नहीं,

क्या मेरी कोई बिसात नहीं,


ना धन का लोभ, ना पाने को,

ना दुनिया में, कुछ अपनाने को,

क्यूँ छाँव के बाद की धूप नहीं,

क्या मेरी कोई बिसात नहीं,


मेरा क्या है, क्या है तेरा,

जीवन तो बस, साँझ सवेरा,

मधुशाला में मधु का रस है,

मुझमें तुझमें रब का रस है,

गुरु के संग, जबसे लगी लौ,

मन कहता है, सुन सब साधो,

सबके रब में, इक बात वही,

बिसात की अब कोई बात नहीं,

बिसात की अब कोई बात नहीं,

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© sudhirbirla