किससे’ ऊँचा उठ जाऊं मैं , उस कद को खोज रहा हूँ मैं

यह कविता मनुष्य की अंतहीन तुलना, महत्वाकांक्षा और “किससे बड़ा” होने की बेचैनी को उजागर करती है। बाहरी ऊँचाइयों की तलाश में भटके मन का सवाल है—कद का माप आखिर किससे तय हो? यह रचना आत्ममंथन की ओर ले जाती है, जहाँ उत्तर बाहर नहीं, भीतर छिपा है।

SUDHIR BIRLA

आगे 'किस' पथ में बढ़ने का,

मकसद खोज रहा हूँ मैं ,

‘किससे’ ऊँचा उठ जाऊं मैं ,

उस कद को खोज रहा हूँ मैं ,

वास-स्थान, उत्तम है किन्तु ,

प्रासाद विशाल, ढूँढ रहा हूँ मैं ,

साज-सामान वाहन, बहु सारे ,

'उससे' बड़ा, ढूँढ रहा हूँ मैं ,

‘किससे’ ऊँचा उठ जाऊं मैं,

उस कद को खोज रहा हूँ मैं ,

धन धान्य से परिपूर्ण, मगर ,

वैभव अनंत, तलाश रहा हूँ मैं ,

विह्वल मन, खुद किया है मैंने ,

अमन परलोक, खोज रहा हूँ मैं ,

‘किससे’ ऊँचा उठ जाऊं मैं ,

उस कद को खोज रहा हूँ मैं ,

ओहदा बड़ा हो, तुझसे मेरा ,

कद कुर्सी का, नाप रहा हूँ मैं ,

रंग आवरण का, तुझसे गहरा ,

विधि इसकी, सोच रहा हूँ मैं ,

‘किससे’ ऊँचा उठ जाऊं मैं ,

उस कद को खोज रहा हूँ मैं ,

जिस का दूध है, सबसे मीठा ,

उस ढोर को, ढूँढ रहा हूँ मैं ,

‘किससे’ ‘किसका’, पंथ बड़ा ,

उस पंथ को, शोध रहा हूँ मैं ,

‘किससे’ ऊँचा उठ जाऊं मैं ,

उस कद को खोज रहा हूँ मैं ,

जब वायु मतभेद करे जीवों में ,

न रहे प्रकृति द्योतक समता की ,

जब रश्मि करे फर्क तृण तरुवर में ,

उस भोर को खोज रहा हूँ मैं ,

नीम के नीचे खाट बिछाकर,

क्यूँ सब सोच रहा हूँ मैं ,

‘किससे’ ऊँचा उठ जाऊं मैं ,

उस कद को खोज रहा हूँ मैं |

© Sudhir Birla