भटका हुआ मुसाफिर

“भटका हुआ मुसाफिर” घर, पहचान और मंज़िल की तलाश में भटके मन की कविता है। यह अकेलेपन, अनकहे सवालों और आत्म-खोज की उस यात्रा को उकेरती है, जहाँ रास्ते हैं—पर ठहराव नहीं।

SUDHIR BIRLA

छोटा ही सही, गली के कोने में

तेरा घर तो है, मेरा बना ही नहीं

ठठा मारते, नुक्कड़ पे खड़े कुछ लोग ,

मेरी राह डगर का, उन्हें पता ही नहीं I


दिल भी फुसलाने में आ गया

बैठा घर में जो, वह तो पेड़ हो गया ,

मैं तो हूँ आवारा सा बादल ,

कहीं ठिकाना ठौर, जमा ही नहीं I


वक़्त से बेखबर , करता रहा सफर मैं ,

कोई हमसफ़र कभी, कभी तनहा मैं ,

हर मुल्क की सरहद, पार की बेशक ,

दिल के आशियाने में, घरोंदा पना ही नहीं I


मुज़रिम है वो, उसका मैं तलबगार ,

कश्मकश में हूँ, उसका मैं गुनहगार ,

अंधेरों में, चिराग तो जलाया उसने ,

रास्तों में फिर भी, रौशनी का पता ही नहीं I


बेसुध फिरता हूँ, उन्हीं सहमी सी गलियों में ,

जहाँ हर नज़र, अंदाज़ से नज़रअंदाज करती है मुझे ,

मैं मजनून मुन्हरिफ़ मुसाफिर मुन्तशिर ,

बेखुदी में जिसे, मंज़िलों का पता ही नहीं।

बेखुदी में जिसे, मंज़िलों का पता ही नहीं।


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