कविता - क्यूं ना बदला मैं

“क्यूं ना बदला मैं” परिवर्तन के बीच स्थिर रह जाने की पीड़ा और आत्मस्वीकार की कविता है। बदलते समय, रिश्तों और हालातों के बीच कवि अपने न बदल पाने की आदत पर ठहरकर सवाल करता है—जहाँ फरेब, दूरी और स्मृतियाँ धीरे-धीरे धुंधली हो जाती हैं। यह रचना आत्ममंथन, विरक्ति और उस मानवीय जड़ता का संवेदनशील चित्रण है, जो सब बदलने पर भी भीतर को वैसा ही छोड़ देती है।

SUDHIR BIRLA

बदलती रुत, बदलता समा, बदलता ज़माना, बदलता इंसां,

बदलती तस्वीर, बदलते ज़िक्र, बदलता वक़्त, बदलते लोग,

क्यूं ना बदला मैं, बदल रही थी रुख लेहरें, जब दामन से किनारों के,

क्यूं ना बदला मैं, बदल रहा था रुख हवा का, जब मेरे आंगन से!

ख़्याल तुम्हें तब भी ना आया, जल रहा था जब गुलिस्तां,

हाथ सेकते रहे तुम सरदी में, अलाव समझ, मुमकिन है;

मिलना दूरियां दर्मियां की बढाता गया हौले हौले,

क्यूं ना बदला मैं, जब बदल रहा था तुम्हें ज़माना फरेब से!

फरेबी रिश्तों की नकाब ओढ़, आज फिरता हूँ तनहा,

छुपता फिर रहा हूँ खुद से मैं, शायद,

ज्युं परिंदे छुपें घोंसले में, घने पत्तों के दर्मियां, दरख्तों के आगोश में,

क्यूं ना बदला मैं, जब बदल रहे थे मौसम खुश्क बहार के!

ना दीखता है अब किनारा दरिया का, धुंध आंखों पे पड़ गई है बहुत,

धूमिल सी यादें, मेरे जुनूं की, अब मुझे सताती भी नहीं,

कुसूर तुमने जो किया, वोह था तुम्हारा नहीं,

आदत है मेरी, मैं न बदला, आदत है मेरी, मैं न बदला,


© sudhirbirla