नज़्म - हवा चली जो हल्के हल्के

“हवा चली जो हल्के-हल्के” एक संवेदनशील नज़्म है, जो प्रेम, विरह और आत्ममंथन की भावनाओं को बेहद कोमलता से उकेरती है। यह रचना इश्क़ की नाज़ुक रवानी, अकेलेपन की टीस और ईश्वर-समान प्रेम की तलाश को शब्दों में पिरोती है—जहाँ एक हल्की हवा भी पूरी ज़िंदगी को फिर से कोरा कर जाती है।

SUDHIR BIRLA

हवा चली जो हल्के हल्के,

आंख भर आई, अश्क यू ढल्के;

धुल गई स्याहि पन्नो से ज़िंदगी की,

कोरा कर गई क़िताब फिर से;

इश्क़ का वज़ूद क्या है आखिर,

रवानी धडकनों की फक़त है शायद;

तन्हा दिल दोज़ख सा लगता है,

ज़रिया जन्नत का फक़त मोहब्बत है;

अजनबी बन गया फिर से,

मुकम्मल जहाँ में, मैं अकेला सा;

खेल है ये कुदरत का,

या मेरे अपनो ने मेरे गुनाहो की सज़ा दी है मुझे;

मेरे मेह्बूब, मेरी क्या खता है,

क्यू खफा है तू, मुझ से क्यू जुदा है;

दरकिनार मत कर, ले चल साहिल तक,

ऐ मेरे मुर्शिद, तू ही मेरा खुदा है;

हवा चली जो हल्के हल्के,

कोरा कर गई क़िताब फिर से; कोरा कर गई क़िताब फिर से;…


© sudhirbirla