जीवन- एक व्यूह चक्र

यह कविता जीवन को एक व्यूह चक्र के रूप में प्रस्तुत करती है—जहाँ जन्म से ही अपेक्षाएँ, भूमिकाएँ और सामाजिक ढाँचे मनुष्य को बाँध लेते हैं। निर्दोष शिशु के माध्यम से यह रचना प्रश्न उठाती है कि क्या जीवन सच में स्वतंत्र है, या पूर्वनिर्धारित चक्र का अनवरत दोहराव।

SUDHIR BIRLA

woman doing yoga meditation on brown parquet flooring

सजने लगे द्वार सोपान ,

एकत्रित हुए अनेक मेहमान ,

वितरित होने लगे मिष्ठान ,

कुछ मुद्रा वस्तु भी हुआ दान |

घन घन बज रही थाली,

नृत्य गान करें आली ,

आगमन नव शिशु का ,

दमकने लगे अंशुमाली |

हर स्थान पे है जगमगाहट ,

कुछ शोर, कुछ फुसफुसाहट ,

आभास एहसास मातृत्व का ,

संग में लज्जा और मुस्कुराहट |

लघु मुस्कान, पैनी दृष्टि ,

कुछ हिचकिचाहट, कुछ घबराहट ,

प्रियजनों के मध्य उपवेशन ,

दर्पित कर रही शिशु की आहट |

आशीष पाहुन सब दे रहे ,

हर विषय कला में पारंगत हो ,

हर विधा में हो पूर्ण युक्त ,

हर स्पर्धा में श्रेणी अग्रिम हो ,

किन्तु,

परिपेक्ष शिशु का कितना उक्त है ,

जन्म परिंदों सा उन्मुक्त है ,

जनक मेरे की भिन्न है दृष्टि ,

आनंद के मध्य, वात्सल्य लुप्त है |

पुरुष के उपनाम का केतु ,

वंश के उत्तरवर्तन हेतु ,

शिशु सोच रहा था परंतु ,

संतति वर्धन का क्या मैं सेतु |

जन्म हुआ, फिर लूँ मैं ज्ञान ,

उपरांत, धन अर्जन के विधि विधान ,

फिर वही जीवन शैली ,

क्यूँ कर करूँ चादर मैं मैली ,

किंकर्तव्यविमूढ़ वह सोच रहा ,

जीवन के कितने आयाम ,

अवतरें कृष्ण शीघ्र जीवन में ,

विधिवत व्यूह चक्र का करें निदान |

विधिवत व्यूह चक्र का करें निदान |

© Sudhir Birla