कविता - दरख्तों ने छांव छीन ली
“दरख़्तों ने छांव छीन ली” बदलते समय की उस विडंबना पर कविता है, जहाँ जो कभी संरक्षण और सुकून का प्रतीक थे, वही असुरक्षा का कारण बन जाते हैं। यह रचना जीवन की नश्वरता, टूटते आश्रयों और स्वार्थ के बीच खोती मानवीय संवेदना को प्रकृति के बिंबों के माध्यम से गहराई से अभिव्यक्त करती है।
दरख्तों ने छांव छीन ली
रुख हवा ने बदल लिया है,
आज फिर पुर्वा चली है,
महकाने शायद चमन को,
खिली जूही की कली है;
खूबसूरत सी ज़िंदगी,
ऐसे सुंदर ख्वाब लाई,
हर घड़ी, हर मोड़ पर,
बेह्तरीन सौगात लाई;
कभी बागबान ने बाग को,
हाथों से अपने था सजाया,
कौन सी विपदा पड़ी जो,
खुद ही गुल्शन को मिटाया;
शाखों पे, घने पत्तों में,
घोंसला क्यूं कर बनाया,
आशियां को आंधियों ने,
ढेर तिंनकों का कराया;
ज़िंदगी की दोपहरी में,
घने पेड़ों के साये थे,
आज गुबार उड़ा यह कैसा,
दरख्तों ने छांव छीन ली, दरख्तों ने छांव छीन ली;
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