शहर का दरवाज़ा

कहाँ इन उजड़ी बस्तियों में, शहर ढूँढते हो,

कहाँ अब लोगों के लहजों में, असर ढूँढते हो।

अपने हाथों उखाड़ फेंके, जब सायादार दरख्त,

तो क्यूँ अब धूप में, सुकून--शजर ढूँढते हो।

कहाँ काँच के मकां में, वफ़ा का शहर ढूँढते हो,

कहाँ झूठे अल्फाज़ों के पीछे, मुकम्मल इंसा ढूँढते हो।

कभी तन्हा बैठकर, गुफ़्तगू कर लो खुद से भी,

अगर तलाश-ए-सुकून में, कोई रूहानी पता ढूँढते हो।

भटकते रहे बाहर, कि कोई तो मुक़ाम मिले,

न रास्तों में सुकून, न ख्वाबों का शहर मिला।

थक हार बैठ, मूँद ली जो आँखें अपनी ,

तब जा मुझे, शहरों में इक शहर मिला |

न ईंटों की दीवारें, न पीपल, न चौबारे,

न संग-ए-मर्मर का ताज, न बस्तियों के नज़ारे।

न मंदिर, न मस्जिद, न कोई कलीसा, न अज़ानें,

जहाँ मुकम्मल हुए हम, बस वहीं एक शहर मिला।

न जंगलों के आदमखोरों का कोई डर,

न शहरों के आदमखोरों का कोई ख़ौफ़।

न काँटों भरी झाड़ियों का ताना-बाना,

बस एक सुनसान वीराने में, मुझे मेरा शहर मिला।

हर शहर में भीड़ थी, तन्हाई थी ,

मुरझाये चेहरों पे, ज़िन्दगी से रुस्वाई थी |

मेरे शहर में, ख़ामोशी कर रही थी गूँज ,

हर पल जैसे, नयी सुबह की अंगड़ाई थी

मेरे शहर में हर दीवार, इक दर्पण है ,

शहरों से ज़रा अलेहदा, मन के अंदर है |

मनुहार करता है मौन में, मुर्शिद से मन मेरा ,

मेरा शहर, शहर नहीं, मुक़द्दस मंदिर है |

तुम शायद, अपने शहरों में मुझे घुमा लाओ,

मैं अपने शहर की सैर नहीं करा सकता।

अगर मेरे दिलपज़ीर शहर की पाट-पानी हो ,

तो अपने शहर का दरवाज़ा खटखटाओ।

तो अपने शहर का दरवाज़ा खटखटाओ।

© Sudhir Birla